
एक बार आचार्य द्रोण अपने शिष्यों – पांडवों और कौरवों को शिक्षा दे रहे थे। वे उनकी वैचारिक और व्यावहारिक प्रगति की परीक्षा लेना चाहते थे। परीक्षण के लिए उन्होंने कौरवों के प्रमुख, दुर्योधन से कहा कि वह समाज में से एक अच्छे व्यक्ति को उनके सामने लाए। दुर्योधन ने बहुत प्रयास किया लेकिन कोई अच्छा व्यक्ति उन्हें नहीं मिला।
फिर द्रोण ने पांडव प्रमुख, युधिष्ठिर से कहा कि वह कोई बुरा आदमी लाए। युधिष्ठिर ने कई स्थानों की खोज की, परंतु उन्हें कोई बुरा व्यक्ति नहीं मिला। वे खाली हाथ लौटे।
जब दोनों का कारण पूछा गया, तो आचार्य ने समझाया कि इंसान जैसा होता है, वह दूसरे को भी वैसा ही देखता है। दुर्योधन की सोच नकारात्मक थी इसलिए उसे कोई अच्छा व्यक्ति नहीं दिखा। जबकि युधिष्ठिर सकारात्मक और नेक थे, इसलिए उन्हें बुरा व्यक्ति नजर नहीं आया।
इस कहानी से यह सिखने को मिलता है कि हमारा दृष्टिकोण और सोच, हमारी वास्तविकता को बनाती है। जैसे हम चीजों को देखते हैं, वैसी ही हमारी दुनिया होती है।
