एक कॉलेज में मनोविज्ञान के प्रोफेसर अपनी क्लास में आए।
सभी छात्र हमेशा की तरह अपनी कॉपी-किताब लेकर तैयार बैठे थे। लेकिन उस दिन प्रोफेसर के हाथ में एक पानी से भरा हुआ ग्लास था।

जैसे ही उन्होंने ग्लास ऊपर उठाया, सभी छात्रों को लगा कि आज फिर वही पुराना सवाल पूछा जाएगा —
“इस ग्लास का वजन कितना है?”
कुछ छात्रों ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया —
“200 ग्राम…”
“250 ग्राम…”
“300 ग्राम…”
प्रोफेसर मुस्कुराए और बोले —
“असल में इस ग्लास का सही वजन मायने नहीं रखता।
मायने यह रखता है कि मैं इसे कितनी देर तक पकड़कर रखता हूँ।”
पूरी क्लास शांत हो गई।
उन्होंने आगे कहा —
“अगर मैं इसे एक मिनट तक पकड़ूँ, तो कोई समस्या नहीं होगी।
अगर एक घंटे तक पकड़ूँ, तो मेरे हाथ में दर्द होने लगेगा।
और अगर पूरे दिन पकड़कर रखूँ, तो मेरा हाथ सुन्न पड़ जाएगा।”
छात्र ध्यान से सुन रहे थे।
प्रोफेसर ने फिर पूछा —
“क्या इतने समय में ग्लास का वजन बदला?”
सभी ने एक साथ कहा —
“नहीं।”
तब प्रोफेसर बोले —
“बिल्कुल हमारी परेशानियाँ भी ऐसी ही होती हैं।
अगर आप उन्हें थोड़ी देर सोचते हैं, तो ठीक है।
लेकिन अगर आप उन्हें पूरे दिन, पूरी रात और हर समय अपने दिमाग में पकड़े रखते हैं…
तो वही परेशानियाँ आपको तोड़ने लगती हैं।”
क्लास में पूरी खामोशी छा गई।
फिर प्रोफेसर ने मुस्कुराकर कहा —
“अगर जिंदगी में खुश रहना है…
तो दिन खत्म होने से पहले अपने दिमाग का ग्लास नीचे रख दीजिये।”
उस दिन छात्रों ने सिर्फ एक कहानी नहीं सुनी थी,
उन्होंने जिंदगी जीने का तरीका सीखा था।
सीख
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