गुरु-दक्षिणा

गांव के किनारे एक छोटा-सा गुरुकुल था, जहाँ दूर-दूर से बच्चे शिक्षा लेने आते थे। उस गुरुकुल के गुरु आचार्य विद्यानंद केवल किताबों का ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते थे। उनके शिष्य उन्हें पिता समान मानते थे।

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उन्हीं शिष्यों में अर्जुन नाम का एक गरीब बालक भी था। उसके पिता किसान थे और घर की हालत बहुत खराब थी। कई बार तो दो वक्त का भोजन भी मुश्किल से मिलता था, लेकिन अर्जुन की आँखों में कुछ बनने का सपना था। गुरुजी ने उसकी लगन देखी और बिना किसी शुल्क के उसे शिक्षा देने लगे।

वर्षों बीत गए। अर्जुन ने मेहनत और गुरुजी के आशीर्वाद से हर विद्या में महारत हासिल कर ली। अब विदाई का समय आ गया था। सभी शिष्य गुरु-दक्षिणा में सोना, चाँदी और कीमती वस्तुएँ लाए। अर्जुन चुपचाप एक कोने में खड़ा था। उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था।

गुरुजी ने उसकी उदासी देखी और मुस्कुराकर पूछा,
“क्या बात है पुत्र?”

अर्जुन की आँखें भर आईं।
“गुरुदेव, मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है। मैं गरीब हूँ… आपकी कृपा का ऋण कभी नहीं चुका सकता।”

गुरुजी ने प्रेम से उसके सिर पर हाथ रखा और बोले,
“मुझे सोना-चाँदी नहीं चाहिए। यदि सच में गुरु-दक्षिणा देना चाहते हो, तो जीवन में हमेशा सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर चलना। किसी जरूरतमंद की मदद करना और अपने ज्ञान का उपयोग समाज की भलाई के लिए करना — यही मेरी सबसे बड़ी गुरु-दक्षिणा होगी।”

अर्जुन ने गुरुजी के चरणों में झुककर वचन दिया।

सालों बाद वही अर्जुन एक बड़ा अधिकारी बना। उसने अपने गांव में स्कूल खुलवाया, गरीब बच्चों की शिक्षा का प्रबंध किया और हर जरूरतमंद की सहायता की। लोग उसकी दयालुता और ईमानदारी की मिसाल देने लगे।

एक दिन अर्जुन फिर अपने गुरुजी से मिलने पहुँचा। गुरुजी ने मुस्कुराकर कहा,
“आज तुमने मेरी दी हुई शिक्षा को समाज तक पहुँचाकर सच्ची गुरु-दक्षिणा दे दी।”

अर्जुन की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वे खुशी और गर्व के आँसू थे।

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