हरे-भरे जंगल के किनारे एक छोटा-सा बगीचा था। उस बगीचे में रंग-बिरंगे फूल खिले रहते थे। हर सुबह वहां चिड़ियों की चहचहाहट और तितलियों की उड़ान से पूरा वातावरण खुशियों से भर जाता था।

उसी बगीचे के एक कोने में एक छोटा-सा कोकून पेड़ की शाखा पर लटका हुआ था। उस कोकून के अंदर एक नन्ही तितली थी, जो बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रही थी।
हर दिन वह कोशिश करती, लेकिन बाहर निकलना आसान नहीं था। उसका छोटा-सा शरीर थक जाता, फिर भी वह हार नहीं मानती। पास से गुजरने वाले कई कीड़े उसका मज़ाक उड़ाते।
एक टिड्डा हंसते हुए बोला,
“तुम कभी बाहर नहीं निकल पाओगी।”
लेकिन तितली ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। वह लगातार कोशिश करती रही।
एक दिन एक छोटा लड़का उस बगीचे में आया। उसने देखा कि तितली बहुत मेहनत कर रही है। उसे तितली पर दया आ गई। उसने एक छोटी कैंची निकाली और कोकून को थोड़ा काट दिया ताकि तितली आसानी से बाहर आ सके।
तितली बाहर तो आ गई, लेकिन उसके पंख कमजोर थे। वह उड़ नहीं पा रही थी।
लड़का हैरान था। तभी पास खड़े एक बूढ़े माली ने कहा,
“बेटा, तितली का यह संघर्ष उसके पंखों को मजबूत बनाता है। अगर वह खुद मेहनत करके बाहर आती, तो उसके पंख उड़ने लायक बन जाते।”
यह सुनकर लड़के को अपनी गलती समझ आ गई।
कुछ दिनों बाद वही तितली फिर से मेहनत करने लगी। धीरे-धीरे उसके पंख मजबूत हुए और एक सुबह वह आसमान में ऊंची उड़ान भरने लगी।
पूरा बगीचा उसकी सुंदर उड़ान देखकर खुश हो गया।