एक घने जंगल के बीचों-बीच एक बड़ा तालाब था। उस तालाब में बहुत सारे मेंढक रहते थे। सभी मेंढक खुशी-खुशी अपना जीवन बिताते थे। एक दिन जंगल में रहने वाले जानवरों ने प्रतियोगिता आयोजित की। प्रतियोगिता यह थी कि जो मेंढक सबसे ऊँची पहाड़ी पर पहले पहुँचेगा, वही विजेता कहलाएगा।

प्रतियोगिता के दिन जंगल में बहुत भीड़ जमा हो गई। सभी जानवर देखने आए कि कौन सा मेंढक इतनी ऊँची पहाड़ी पर चढ़ पाएगा।
जैसे ही प्रतियोगिता शुरू हुई, सभी मेंढक तेजी से पहाड़ी पर चढ़ने लगे। लेकिन पहाड़ी बहुत कठिन थी। रास्ता फिसलन भरा था और जगह-जगह पत्थर पड़े थे।
नीचे खड़े जानवर जोर-जोर से बोल रहे थे—
“यह असंभव है!”
“कोई भी मेंढक ऊपर नहीं पहुँच पाएगा!”
“इतनी ऊँचाई चढ़ना इनके बस की बात नहीं!”
इन बातों को सुनकर कई मेंढकों का हौसला टूट गया। वे धीरे-धीरे रुकने लगे और हार मानकर वापस लौट आए।
लेकिन एक छोटा सा मेंढक लगातार आगे बढ़ता रहा। वह बिना रुके चढ़ता गया। रास्ता कठिन था, फिर भी उसने हार नहीं मानी।
आखिरकार वही छोटा मेंढक पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गया। सभी जानवर हैरान रह गए।
जब उससे पूछा गया कि उसने यह कैसे कर दिखाया, तब पता चला कि वह मेंढक बहिरा था। उसे किसी की नकारात्मक बातें सुनाई ही नहीं दीं।
उसने सिर्फ अपने लक्ष्य पर ध्यान दिया और सफलता हासिल कर ली।